सबनानी पहले जनता से जीते, फिर हाईकोर्ट से और अब सुप्रीम कोर्ट से भी जीत गए हैं…

नई दिल्ली/ भोपाल, सं. प्रशांत झिलपे – सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी के निर्वाचन के विरुद्ध कांग्रेस प्रत्याशी पी.सी. शर्मा की याचिका खारिज की
सर्वोच्च न्यायालय ने 152-भोपाल दक्षिण-पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी पी.सी. शर्मा (प्रकाश मांगीलाल शर्मा) द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (सिविल) क्रमांक 12201/2026 को खारिज कर दिया है। यह याचिका मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसके द्वारा भगवानदास सबनानी के निर्वाचन को चुनौती देने वाली उनकी चुनाव याचिका खारिज कर दी गई थी। [माननीय न्यायमूर्तिगण] की पीठ ने [दिनांक] को दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं को सुनने के पश्चात याचिका खारिज की। इस आदेश के साथ सबनानी के निर्वाचन को दी गई चुनौती समाप्त हो गई है और उच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम हो गया है।
सबनानी 3 दिसंबर 2023 को इस क्षेत्र से निर्वाचित घोषित हुए थे। उन्हें 76,689 मत प्राप्त हुए थे, जबकि शर्मा को 60,856 मत मिले थे, और इस प्रकार जीत का अंतर 15,833 मतों का रहा। इसके पश्चात शर्मा ने जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका क्रमांक 15/2024 दायर कर यह आरोप लगाया कि राज्य तंत्र की मिलीभगत से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में हेरफेर किया गया। यह आरोप केवल मतगणना के समय ईवीएम की बैटरी के स्तर से निकाले गए अनुमान पर आधारित था, जिसके अनुसार अधिकांश मशीनों में बैटरी 99 प्रतिशत और कुछ मशीनों में 80 प्रतिशत से कम दर्शाई गई थी।
उच्च न्यायालय (माननीय न्यायमूर्ति विशाल धगट) ने 2 अप्रैल 2025 के निर्णय द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अंतर्गत सबनानी का आवेदन स्वीकार करते हुए चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने पाया कि ईवीएम तक पहुंच रखने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्ट आचरण का कोई विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया, निर्वाचित प्रत्याशी के साथ मिलकर राज्य तंत्र द्वारा किए गए ऐसे किसी कृत्य का उल्लेख तक नहीं है जिससे परिणाम प्रभावित हुआ हो, तथा आरोप सामान्य प्रकृति के हैं और भ्रष्ट आचरण का विवरण अनुपस्थित है। उच्च न्यायालय ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 83 के अनुपालन के अभाव में चुनाव याचिका खारिज नहीं की जा सकती, और यह माना कि अधिनियम की धारा 81, 83 तथा 100 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष शर्मा ने यह तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया, उनकी याचिका में विचारणीय प्रश्न उत्पन्न होते हैं, और आवश्यक विवरण मतगणना प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज के माध्यम से विचारण के दौरान सिद्ध किए जा सकते थे, जिसे निर्वाचन अधिकारियों ने उन्हें उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था।
सबनानी की ओर से यह निवेदन किया गया कि चुनाव याचिका में अधिनियम की धारा 83 द्वारा अपेक्षित तात्विक तथ्य (मटेरियल फैक्ट्स) अभिवचित ही नहीं किए गए। लगभग 235 मतदान केंद्रों वाले इस क्षेत्र में याचिका में न किसी मतदान केंद्र का, न किसी ईवीएम का, न किसी व्यक्ति का और न ही कथित छेड़छाड़ की तिथि, स्थान या तरीके का उल्लेख था, और यह तक नहीं बताया गया कि 15,833 मतों के अंतर से तय हुआ परिणाम किस प्रकार तात्विक रूप से प्रभावित हुआ। यह भी निवेदन किया गया कि विचारण का उपयोग वाद कारण खोजने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता, निर्वाचनों का संचालन नियम, 1961 के नियम 93(1) के अंतर्गत सीसीटीवी फुटेज न दिए जाने से याचिकाकर्ता को अपनी स्वयं की जानकारी के तथ्य अभिवचित करने से कोई रोक नहीं थी, और ईवीएम की विश्वसनीयता, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2024) में बरकरार रखा है, मात्र अनुमान के आधार पर संदिग्ध नहीं ठहराई जा सकती।
पक्षकारों की ओर से उपस्थिति
याचिकाकर्ता पी.सी. शर्मा की ओर से: विवेक तन्खा, वरिष्ठ अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी भगवानदास सबनानी की ओर से: महेश जेठमलानी, वरिष्ठ अधिवक्ता, एवं कनु अग्रवाल, अधिवक्ता।



