मध्य प्रदेश

भोपाल: गाडरवाडा मे श्री देव रामजानकी गोशाला में अन्नकूट एवं गो-प्रतिष्ठा संगोष्ठी का भव्य आयोजन…

मध्यप्रदेश, गाडरवारा, सं. प्रशांत झिलपे- संतो ने कहा ‘गोवंश की रक्षा से ही सनातन धर्म, संस्कृति और पर्यावरण का संतुलन संभव माँ नर्मदा क्षेत्र के पावन ग्राम बगदरा (गाडरवारा, जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश) स्थित श्री देव रामजानकी गोशाला मैं एक ऐतिहासिक और भव्य आयोजन हुआ, जिसमें अन्नकूट महोत्सव और गो-प्रतिष्ठा संगोष्ठी का संयुक्त कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर क्षेत्रभर से पधारे संत-महात्मा, समाजसेवी, गोभक्त और सैकड़ों ग्रामीण श्रद्धालुओं ने बड़ीं श्रदधा और भक्ति के साथ भाग लिया। नर्मदा तट की पावन धारा के समीप आयोजित यह कार्यक्रम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक बन गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वेद-मंत्रों की मंगलध्वनि और माँ नर्मदा आरती के साथ हुआ। तत्पश्चात पवित्र कपीला गाय की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। गोशाला परिसर में उपस्थित 350 से अधिक गौर गौमाताओं का वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक, पुष्पार्चन और पूजन संपन्न हुआ। भक्तों ने प्रेमपूर्वक गौमाताओं को गुड़, हरा चारा और पुष्प माला अर्पित की। इस दौरान वातावरण “गोमाता की जय’, ‘जय श्री नर्मदा मैया”, “गोसेवा ही धर्म सेवा” जैसे नारों

से गूंज उठा। “यदि सनातन धर्म को सुरक्षित रखना है. तो सबसे पहले गोवंश की रक्षा आवश्यक है। गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि वह हमारी माता है. जो पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बनाए रखती है।”

संतों ने स्पष्ट कहा कि अब समय आ गया है कि केवल सरकार पर निर्भर न रहकर समाज स्वयं आगे आए। जब सन्त, समाज और संगठन एक सूत्र में जुड़ेंगे तभी गोवंश की समुचित रक्षा और संवर्धन संभव होगा। कार्यक्रम में गोशाला के संचालक गोभक्त महन्त बालकदास महाराज जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि यह गोशाला केवल गोसेवा का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन धर्म, करुणा और संस्कारों की जीवंत प्रेरणा है। उन्होंने कहा-‘गाय के माध्यम से ही हम सृष्टि, धर्म और मानवता को जोड़ सकते हैं। गोसेवा केवल पुण्य नहीं, यह हमारे जीवन का कर्तव्य है।”

बालकदास महाराज जी ने बताया कि श्री देव रामजानकी गोशाला में गोवंश की सेवा के साथ साथ जैविक खेती, गोबर गैस संयंत्र और प्राकृतिक खाद निर्माण जैसे प्रयोग भी चल रहे हैं। इससे गोशाला आत्मनिर्भर बन रही है और आसपास के किसान भी इससे लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में गोशाला को एक आदर्श गोसेवा केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति गोसेवा से जुड़ सकेगा। “गोवंश ही सनातन धर्म का मुलाधार है। जब तक गाय जीवित रहेगी, तब तक धर्म, संस्कृति और पर्यावरण का संतुलन बना रहेगा। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब मिलकर गोवंश के संरक्षण के लिये एकजुट हो। केवल सरकार के भरोसे रहकर यह कार्य नहीं हो सकता।”

स्वामी दुर्गा दास जी ने बताया कि स्काई हेल्प ऑर्गनाइजेशन ‌द्वारा एक विशेष ‘गोवंश और पर्यावरण एकता अभियान शुरु किया जा रहा है. जिसका उद्‌देश्य पूरे भारत में फैली गौशालाओं और गोसेवकों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ना है। इससे हर गोशाला को आवश्यक सहायता, भोजन सामग्री, चारा और चिकित्सा सुविधा आसानी से उपलब्ध कराई जा सकेगी। उन्होंने कहा कि जैसे वक्ष पृथ्वी की श्वास हैं, वैसे ही गाय पृथ्वी की माता है। गाय के गोबर और गौमूत्र से न केवल जैविक खेती संभव होती है, बल्कि यह भूमि की उर्वरता बढ़ाकर जल और वायु को भी शुद्ध करता है।

स्वामी जी ने कहा- ‘गोसेवा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि यह पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलन है। जिस दिन हर परिवार एक गाय की सेवा का संकल्प ले लेगा, उस दिन से भारत आत्मनिर्भर, समृद्ध और संतुलित राष्ट्र बन जाएगा।” संगोष्ठी में उपस्थित संतों ने यह भी सुझाव दिया कि हर जिले में ‘गोसंरक्षण समिति का गठन किया जाए, जो स्थानीय स्तर पर गोशालाओं की देखरेख, चिकित्सा व्यवस्था और गौचारा प्रबंधन सुनिश्चित करे। उन्होंने कहा कि अगर समाज के हर वर्ग का सहयोग मिल जाए, तो कोई भी गाय सड़क पर भूखी नहीं रहेगी।

इस अवसर पर संतों, माताओं और बहनों ने सामूहिक रूप से ‘गो आरती’ की, जिसके दौरान वातावरण भक्ति, श्रद्धा और प्रेम से भर गया। ‘गोमाता तेरी जय”, “जय श्री राम”, “हर हर महादेव” के उद्घोष से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा। आरती के बाद भक्तों को अन्नकूट प्रसादी वितरित की गई, जिसमें सैकडों श्र‌द्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

स्काई हेल्प ऑर्गनाइजेशन के तत्वावधान में पर्यावरण संरक्षण पर भी एक विशेष सत्र रखा गया, जिसमें बताया गया कि गाय के गोबर से बने दीये, धूपबत्ती, जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक कैसे प्रदूषण को कम कर सकते हैं और किसानों की लागत घटा सकते हैं। संस्था ने घोषणा की कि आने वाले समय में ‘गो आधारित उत्पाद प्रशिक्षण केंद्र’ स्थापित किए जाएंगे, जहाँ ग्रामीण महिलाएँ इन उत्पादों को बनाकर आत्मनिर्भर हो सकेंगी।

कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित संतों, गोभक्तों और श्र‌द्धालुओं ने सामूहिक रूप से एक संकल्प लिया कि वे

अपने जीवन में कम से कम एक गाय के भोजन की व्यवस्था का दायित्व निभाएँगे। साथ ही गोशाला की दैनिक सेवा हेतु ‘गोसेवा निधि’ में आर्थिक सहयोग की घोषणा की गई। यह निधि गोशाला के चारा, चिकित्सा और विस्तार कार्यों में उपयोग होगी।

हे गोमाता, है नर्मदा मैया, हमें सद्बु‌द्धि दो ताकि हम सच्चे मन से धर्म, गोवंश और पर्यावरण की रक्षा कर सकें।” इस प्रकार श्री देव रामजानकी गोशाला का यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि यह सनातन धर्म, गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण के एक नये अध्याय की शुरुआत बन गया।

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