दंतेवाड़ा में एक अनोखा स्कूल ‘सक्षम’, जो दिव्यांग बच्चों को शिक्षा और खेल-कूद के माध्यम से आत्मनिर्भर बना रहा है

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़):
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भारतीय पुनर्वास परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त यह आवासीय स्कूल अपनी तरह का पहला मॉडल है, जो दिव्यांगता की सभी 21 श्रेणियों के बच्चों को एक ही छत तले शिक्षा के साथ-साथ विशेष थेरेपी, पुनर्वास, खेल और व्यावसायिक प्रशिक्षण निःशुल्क प्रदान कर रहा है।
अटल बिहारी वाजपेयी एजुकेशन सिटी, जावंगा में स्थित यह ‘सक्षम’ स्कूल न केवल जन्मजात दिव्यांग बच्चों को शिक्षा की बाधाओं को दूर करने में मदद कर रहा है, बल्कि माओवादी हिंसा के शिकार लोगों सहित उन बच्चों का भी पुनर्वास कर रहा है, जो बाद में दिव्यांगता का शिकार हुए हैं।
वर्ष 2014 में स्थापित इस संस्थान का संचालन दंतेवाड़ा जिला प्रशासन द्वारा एनएमडीसी के नैगम सामाजिक दायित्व (CSR) कार्यक्रम के तहत वित्तीय सहायता से किया जाता है। वर्तमान में सक्षम के दोनों स्कूलों — लड़कों के लिए सक्षम और लड़कियों के लिए सक्षम — में कुल 200 छात्र हैं, जिनमें 100 लड़के और 100 लड़कियां शामिल हैं। यह संस्थान पहली कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक दिव्यांग बच्चों को शिक्षा, भोजन, आवास, थेरेपी और पुनर्वास की सुविधाएं पूरी तरह निःशुल्क प्रदान करता है।
संस्थान के अधीक्षक प्रमोद कर्मा के अनुसार, सक्षम भारतीय पुनर्वास परिषद के दिशानिर्देशों के तहत दिव्यांगता की सभी 21 श्रेणियों के बच्चों की जरूरतों को पूरा करता है। यही विशेषता इसे एक अनूठा संस्थान बनाती है, जहां विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं वाले बच्चों को एक ही परिसर में शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाता है।
कर्मा ने कहा, “मेरा मानना है कि यह न केवल छत्तीसगढ़ में, बल्कि पूरे देश में पहला ऐसा संस्थान है, जहां सभी 21 प्रकार की दिव्यांगताओं वाले बच्चों को एक ही परिसर और एक ही स्कूल के भीतर शिक्षा की विभिन्न विधाओं से जोड़ा जाता है।”
स्कूल का दृष्टिकोण इसे पारंपरिक शिक्षा से कहीं आगे ले जाता है। इसके सहायता तंत्र में फिजियोथेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, ऑडियोलॉजिस्ट, विशेष शिक्षक और शारीरिक प्रशिक्षण प्रदान करने वाले प्रशिक्षक शामिल हैं, जिससे छात्रों को उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार सहायता मिलती है।
इस संस्थान में हाथ की कमजोर पकड़, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और टांगों की लंबाई में अंतर जैसी स्थितियों से जूझ रहे बच्चों को फिजियोथेरेपी दी जाती है। रोजमर्रा के कौशल विकसित करने और आत्मनिर्भरता पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए ऑक्यूपेशनल थेरेपी प्रदान की जाती है। ऐसे छात्रों, जिन्हें सुनने और बोलने में समस्या आती है, उन्हें उनकी जरूरत के अनुरूप विशेष उपकरणों का उपयोग करके स्पीच थेरेपी दी जाती है।
इसके अलावा, सक्षम उन बच्चों को भी सहायता प्रदान करता है जिनकी दिव्यांगता उस हिंसा का परिणाम है, जिसने दशकों से बस्तर को प्रभावित किया है।
बीजापुर जिले के कमलेश ने एक आईईडी विस्फोट में अपना दाहिना पैर खो दिया था। सक्षम में उन्हें एक कृत्रिम अंग (प्रोस्थेटिक लिम्ब) के साथ-साथ पुनर्वास सहायता भी प्रदान की गई, जिससे उन्हें अपनी दिव्यांगता के साथ तालमेल बिठाने और अपनी शिक्षा जारी रखने में मदद मिली।
संस्थान का पुनर्वास पर जितना जोर है, उतना ही ध्यान वह उन छिपी हुई प्रतिभाओं को निखारने पर भी देता है, जो अन्यथा सामने नहीं आ पातीं।
ग्रोथ हार्मोन की कमी से जूझ रहे छात्र प्रिंस यहां घुड़सवारी के शौकीन बनकर उभरे हैं और अब राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग ले रहे हैं। उन्होंने पिछले दो वर्षों से सक्षम में घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया है और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तर की प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करने का लक्ष्य रखते हैं।
सक्षम की खेल गतिविधियों में घुड़सवारी भी शामिल है। यहां के छात्र टेबल टेनिस, वॉलीबॉल और कई तरह के इनडोर तथा आउटडोर खेलों में भी भाग लेते हैं। स्कूल बच्चों की रुचि और उनकी क्षमताओं के आधार पर उन्हें अलग-अलग खेलों से जोड़ता है। कई छात्र राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।
कर्मा के अनुसार, स्कूल की सफलता की असली कसौटी यह है कि यहां से पढ़ाई पूरी कर निकलने के बाद छात्र अपने जीवन में किस प्रकार सफलता हासिल करते हैं और अपने लिए एक स्वतंत्र भविष्य बनाते हैं।
सक्षम के पूर्व छात्रों में किशन मंडावी भी शामिल हैं, जो सिविल इंजीनियर बने हैं। रोहित पेंगर ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए क्वालीफाई किया, जबकि रूपेश मरकाम ने हाल ही में नीट परीक्षा के लिए क्वालीफाई किया। सक्षम से कक्षा 12 पूरी करने वाले एक दिव्यांग छात्र आकाश सुकमा में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं।
कर्मा के अनुसार, अब तक कुल 37 पूर्व छात्र सरकारी नौकरियों सहित विभिन्न व्यवसायों और पेशों में प्रवेश कर चुके हैं।
स्कूल की कार्यप्रणाली ऐसी है कि शिक्षा, पुनर्वास और आत्मनिर्भरता को अलग-अलग लक्ष्यों के बजाय आपस में जोड़कर देखा जाता है। उदाहरण के लिए, जिस बच्चे को फिजियोथेरेपी की आवश्यकता होती है, उसे खेलों में भी शामिल किया जाता है। वहीं, जिसे विशेष शिक्षण सहायता की जरूरत होती है, उसे व्यावसायिक प्रशिक्षण और मुख्यधारा की शिक्षा के अवसर भी प्रदान किए जाते हैं।
छात्रों को कला, शिल्प, संगीत तथा अन्य व्यावसायिक कौशलों में प्रशिक्षित किया जाता है, जबकि विशेष शिक्षक बच्चों की दिव्यांगता और सीखने की जरूरतों के अनुसार उन्हें प्रशिक्षित करते हैं।
एनएमडीसी के CSR कार्यक्रम के तहत सक्षम को पूरी तरह वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। क्षेत्र में स्थित प्रमुख खनन कंपनी एनएमडीसी ने सक्षम-II के निर्माण के लिए 2 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है तथा संस्थान के परिचालन व्यय के लिए सालाना 3 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जाती है।
सक्षम के दोनों स्कूलों में कुल 200 छात्र रहते और पढ़ते हैं। यहां उन्हें ऐसा आवासीय वातावरण उपलब्ध कराया जाता है, जहां शिक्षा, थेरेपी, भोजन, आवास और पुनर्वास को एक ही व्यवस्था में एकीकृत किया गया है।
सुदूर और आर्थिक रूप से पिछड़े जिले के बच्चों के लिए इस तरह के मॉडल का महत्व केवल स्कूली शिक्षा तक सीमित नहीं है। यह परिवारों को अपने बच्चों को दूर भेजे बिना विशेष सहायता प्राप्त करने में सक्षम बनाता है तथा छात्रों को प्रतिस्पर्धा करने, कौशल हासिल करने और अंततः कार्यबल में शामिल होने के अवसर प्रदान करता है।
माओवादी विस्फोट में अपना अंग खोने वाले बच्चे से लेकर घुड़सवारी में राष्ट्रीय पदक जीतने का लक्ष्य रखने वाले बच्चे तक, सक्षम के छात्रों की दिव्यांगता और उनकी कहानियां भले ही अलग हों, लेकिन जो चीज उन्हें आपस में जोड़ती है, वह है एक ऐसा भविष्य गढ़ने का अवसर जो उनकी कमियों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वे क्या सीख सकते हैं, क्या हासिल कर सकते हैं और समाज में क्या योगदान दे सकते हैं।
दंतेवाड़ा में सक्षम इस सोच को एक संस्थान में बदलने का प्रयास कर रहा है — एक ऐसा संस्थान जो शिक्षा, पुनर्वास और अवसर को एक ही परिसर में साथ लाकर दिव्यांग बच्चों को निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।



